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भक्ति

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भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥               मानस , 7/45/3 "भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है, परंतु सत्संग (संतों के संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते और पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरण के चक्र) का अंत करती है।" भक्ति सभी साधनों से अलग है। उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं, केवल निरंतर सत्संग करने से ही मिल सकती है। भक्त को अन्य किसी आधार की जरूरत नहीं। भक्ति केवल हृदय की भावना प्रभु को अर्पित करने का नाम है। विशुद्ध भगवत्प्रेम का नाम ही भक्ति है। इस प्रकार के प्रेम की प्राप्ति संतों के संग से अनायास ही हो जाती है क्योंकि संत-महात्माओं के यहाँ परम प्रभु परमेश्वर के गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य की कथाएँ होती रहती हैं। भगवत्कथा अनेक जन्मों की अनंत पापराशि का नाश करने वाली एवं हृदय और कानों को अतीव आनंद देनेवाली है। यज्ञ, दान, तप, व्रत, तीर्थ आदि बहुत परिश्रम-साध्य पुण्य-साधनों के द्वारा भी वह लाभ नहीं प्राप्त होता, जो कि सत्संग से अनायास ह...

आदरणीय श्री रविशराय गौड़ जी

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*श्रीचित्रगुप्त शोध चिंतन* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *ॐ चित्रगुप्त नमस्तुभ्यम् विचित्राय नमों नमः।* *नरकार्ति प्रशांत्यर्थम् कामान्यच्छ ममेप्सितान्।।* *ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नम:* 🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *संसार यानि प्रकृति आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है, स्थूल तत्व हैं जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश और दिव्य तत्व है बुद्धि, मन और अहंकार हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं, एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं, और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं।* *बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है, सबसे पहले हमें बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, (अहंकार- अहं + आकार ) स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं, शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना मिथ्या अहंकार कहलाता है, और जीव रूप को अपना समझना शाश्वत अहंकार कहलाता है।* *जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप में करता रहता है तो वह मिथ्या अहंकार (अवास्तविक स्वरूप) से ग्रसित रहता है, तब तक सभी मन...

ॐ श्री गणेशाय नमः

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ॐ श्री गणेशाय नमः