भक्ति

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सतसंगति संसृति कर अंता॥

             मानस , 7/45/3

"भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है, परंतु सत्संग (संतों के संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते और पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरण के चक्र) का अंत करती है।"

भक्ति सभी साधनों से अलग है। उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं, केवल निरंतर सत्संग करने से ही मिल सकती है। भक्त को अन्य किसी आधार की जरूरत नहीं। भक्ति केवल हृदय की भावना प्रभु को अर्पित करने का नाम है।


विशुद्ध भगवत्प्रेम का नाम ही भक्ति है। इस प्रकार के प्रेम की प्राप्ति संतों के संग से अनायास ही हो जाती है क्योंकि संत-महात्माओं के यहाँ परम प्रभु परमेश्वर के गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य की कथाएँ होती रहती हैं। भगवत्कथा अनेक जन्मों की अनंत पापराशि का नाश करने वाली एवं हृदय और कानों को अतीव आनंद देनेवाली है। यज्ञ, दान, तप, व्रत, तीर्थ आदि बहुत परिश्रम-साध्य पुण्य-साधनों के द्वारा भी वह लाभ नहीं प्राप्त होता, जो कि सत्संग से अनायास ही हो जाता है, क्योंकि प्रेमी संत-महात्माओं के द्वारा कथित भगवत्कथा के श्रवण से जीव के पापों का नाश हो जाता है। इससे अंतःकरण अत्यन्त निर्मल होकर भगवान् के चरणकमलों में सहज ही श्रद्धा-प्रीति उत्पन्न हो जाती है।

इस जीव को संसार के किसी भी उच्च से उच्च पद या पदार्थ की प्राप्ति क्यों न हो जाये, इसकी भूख तब तक नहीं मिटती, जब तक कि यह अपने परम आत्मीय भगवान् को प्राप्त नहीं कर लेता, क्योंकि भगवान् ही एक ऐसे हैं जिनसे सब तरह की पूर्ति हो सकती है। उनके सिवा सभी अपूर्ण हैं। पूर्ण केवल एक ही हैं और वे पूर्ण होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति बिना कारण ही प्रेम और कृपा करनेवाले परम सुहृद हैं। साथ ही वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान भी हैं। कोई सर्वसुहृद् तो हो पर सब कुछ न जानता हो, वह हमारे दुःख को न जानने के कारण उसे दूर नहीं कर सकता और यदि सब कुछ जानता हो पर सर्वसमर्थ न हो तो भी असमर्थता के कारण दुःख दूर नहीं कर सकता एवं सब कुछ जानता भी हो और समर्थ भी हो, तब भी यदि सुहृद् न हो तो दुःख देखकर भी उसे दया नहीं आती, जिससे वह हमारा दुःख दूर नहीं कर सकता। किंतु भगवान् में उपर्युक्त तीनों बातें एक साथ एकत्रित हैं।

जो भक्त दृढ़ता के साथ भगवान् के नाम का जप और स्वरूप का ध्यानरूप भक्ति करते हुए तेजी से चलता है, सन्तों की सत्संगति करता है, वही भगवान् को शीघ्र प्राप्त कर लेता है।

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
अध्यात्मचिन्तक
9926910965

*नारायण श्रीनारायण*

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